
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी ‘पीएम जनमन योजना’:आदिवासी बैगा समाज आक्रोशित, लकड़ी से उरेदने पर उखड़ रही डामर की परत
गंडई पंडरिया- केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘प्रधानमंत्री जनमन योजना’, जिसका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों का कायाकल्प करना है, क्षेत्र में भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। ग्राम पंचायत श्रृंगारपुर के आश्रित ग्राम तुमड़ादाह में बन रही सड़क ने शासन-प्रशासन के विकास के दावों की पोल खोल दी है। आलम यह है कि ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन करते हुए महज एक छोटी सी लकड़ी से सड़क को उरेद कर दिखा दिया कि डामर की परत कितनी खोखली है।
करोड़ों की लागत, विकाश केवल ‘कागजी’
ठाकुरटोला-लावातरा रोड से बैगापारा तक बन रही 1.700 किलोमीटर लंबी इस सड़क की अनुमानित लागत लगभग 116.810 लाख रुपये है। इतनी भारी-भरकम राशि के बावजूद जमीनी हकीकत डरावनी है। निर्माण कार्य पूरा हुए एक माह बीत चुका है, लेकिन डामर की परत अब तक सेट नहीं हो पाई है। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार ने तकनीकी मापदंडों को ताक पर रखकर केवल औपचारिकता पूरी की है।

सूचना पटल पर ‘सच’, लुट जमीन पर
मौके पर लगे सूचना बोर्ड और वास्तविक निर्माण में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिल रहा है:-
1 मटेरियल की चोरी: ग्रामीणों के अनुसार, बोर्ड पर 10 डम्पर से अधिक डामरीकृत मटेरियल डालने का उल्लेख है, जबकि मौके पर मात्र 5 से 6 डम्पर मटेरियल में ही पूरी सड़क की ‘इतिश्री’ कर दी गई।
2 बेस निर्माण में धांधली: तकनीकी गाइडलाइन के अनुसार बेस तैयार करने के बजाय, ठेकेदार ने मुरम का उपयोग कर खानापूर्ति कर दी है।
3 लकड़ी से उखड़ती सड़क: ग्रामीण भगवान सिंह पोर्ते, सुखराम बैगा और जलेश पोर्ते ने प्रदर्शन के दौरान दिखाया कि सड़क इतनी कच्ची है कि उसे हाथ या लकड़ी से आसानी से उखाड़ा जा सकता है।
“यह सड़क पहली बारिश भी नहीं झेल पाएगी। हम आदिवासियों को सड़क बनने से पहले जो तकलीफ थी, घटिया निर्माण के कारण उससे कहीं ज्यादा मुसीबत झेलनी पड़ेगी। यह सीधे तौर पर हमारी आंखों में धूल झोंकने जैसा है।” — स्थानीय ग्रामीण
सरपंच ने भी खोली पोल “भ्रष्टाचार स्पष्ट है”
ग्राम पंचायत श्रृंगारपुर के सरपंच चंद्रकुमार ने भी निर्माण कार्य में गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि की है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि डब्ल्यूबीएम और डामरीकरण, दोनों ही स्तरों पर भारी भ्रष्टाचार हुआ है। शिकायतों के बावजूद ठेकेदार की कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं आया और न ही विभाग ने इसे गंभीरता से लिया है।आज तक कोई जांच नही हुई है।
प्रशासन की ‘रहस्यमयी’ चुप्पी पर उठ रहे सवाल
सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की कार्यशैली पर है। बार-बार मीडिया में खबरें आने और ग्रामीणों के लगातार विरोध के बावजूद अब तक कोई उच्च स्तरीय जांच टीम मौके पर नहीं पहुंची है। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार को शासन-प्रशासन का ‘मौन समर्थन’ प्राप्त है। यह चुप्पी इस संदेह को पुख्ता करती है कि कहीं विभागीय अफसरों और ठेकेदार के बीच कोई सांठगांठ तो नहीं? कही ये कृत्य सरकार को बदनाम करने की नीयत तो नही है।
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आदिवासी समाज में बढ़ता आक्रोश
बैगा आदिवासी परिवारों में इस घटिया निर्माण को लेकर भारी नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक सड़क का मामला नहीं है, बल्कि यह केंद्र सरकार की छवि को धूमिल करने और आदिवासी समाज के अधिकारों पर डाका डालने का प्रयास है। यदि जल्द ही इस पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई और सड़क का पुनर्निर्माण गुणवत्ता के साथ नहीं किया गया, तो क्षेत्र की जनता उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगी।
मुख्य बिंदु जो जांच के घेरे में हैं:-
1 निर्धारित मात्रा से कम डामर का उपयोग क्यों किया गया?
2 बेस निर्माण में स्वीकृत मटेरियल की जगह मुरम का उपयोग किसकी अनुमति से हुआ?
3 समय सीमा (10 फरवरी 2026) खत्म होने के बाद भी कार्य की गुणवत्ता ऐसी क्यों है?
4 शिकायत के बाद भी अब तक संबंधित अधिकारियों ने सुध क्यों नहीं ली?
रिपोर्टर-विनोद नामदेव गंडई
8109994877
