
(फाइल फोटो)
गंडई के शैक्षणिक अस्तित्व पर प्रहार,116 परीक्षार्थियों के भविष्य से ‘प्रशासनिक खिलवाड़’ या कोई गहरी साजिश?
गंडई-पंडरिया -शासन की महत्वाकांक्षी योजनाएं ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और ‘सब पढ़ें-सब बढ़ें’ गंडई के धरातल पर दम तोड़ती नजर आ रही हैं। विगत 10 वर्षों (2015) से जिस गंडई में ओपन स्कूल का परीक्षा केंद्र सुचारू रूप से संचालित हो रहा था, उसे इस वर्ष अचानक और रहस्यमयी ढंग से छुईखदान स्थानांतरित कर दिया गया है। यह केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि गंडई की क्षेत्रीय अस्मिता और सैकड़ों छात्रों के भविष्य पर किया गया ‘कुठाराघात’ है।
षड्यंत्र या प्रमाद? किसके इशारे पर बदला गया केंद्र?
सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह है कि जब एक दशक से व्यवस्थाएं चाक-चौबंद थीं, तो इस वर्ष अचानक ऐसा क्या हुआ कि केंद्र को स्थानांतरित करना पड़ा? क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि क्या यह महज एक ‘प्रशासनिक चूक’ है या इसके पीछे किसी रसूखदार का ‘इशारा’ है? बिना किसी सार्वजनिक सूचना के, ऐन परीक्षा के वक्त लिया गया यह निर्णय किसी ‘सोची-समझी साजिश’ की ओर संकेत करता है, जिसका उद्देश्य गंडई के शैक्षणिक महत्व को कम करना प्रतीत होता है।
नियमों की धज्जियां: क्या कहते हैं विभाग के कायदे?
यदि हम शिक्षा विभाग के नियमों को खंगालें, तो स्पष्ट है कि 50 से 100 परीक्षार्थियों की उपस्थिति पर एक स्वतंत्र परीक्षा केंद्र बनाया जा सकता है। गंडई में इस वर्ष 116 परीक्षार्थी दर्ज हैं, जो निर्धारित मापदंडों से कहीं अधिक हैं। संख्या बल और पिछले 10 साल का सफल रिकॉर्ड गंडई के पक्ष में होने के बावजूद, केंद्र को छुईखदान शिफ्ट करना नियमों को ताक पर रखने जैसा है। आखिर किस ‘अदृश्य नियम’ के तहत 116 छात्रों के हक को छीनकर उन्हें 20 किमी दूर भटकने पर मजबूर किया गया?
व्यापारिक गतिविधियों पर ‘आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक’
परीक्षा केंद्र केवल शिक्षा का मंदिर नहीं होता, बल्कि वह स्थानीय अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी होता है।
व्यापार पर असर:- गंडई के व्यापारियों का कहना है कि परीक्षा के दौरान सैकड़ों परीक्षार्थी और उनके परिजन शहर आते हैं। इससे खान-पान, स्टेशनरी और परिवहन जैसे छोटे-बड़े व्यवसायों में तेजी आती है।
आर्थिक नुकसान:-केंद्र हटने से गंडई के स्थानीय बाजार को भी आर्थिक क्षति हुई है। प्रशासन का यह कृत्य क्षेत्र की व्यापारिक उन्नति में ‘सेंधमारी’ करने जैसा है।
क्षेत्रीय गौरव और महिलाओं की शिक्षा पर ‘पूर्णविराम’
इस आयोजन से गंडई क्षेत्र का नाम रोशन होता था, जिसे प्रशासन ने एक झटके में धूमिल कर दिया। सबसे दुखद पहलू उन विवाहित और कामकाजी महिलाओं का है, जो घर और मजदूरी के बीच शिक्षा की लौ जलाए हुए थीं। परिजनों का दो टूक कहना है कि छुईखदान केंद्र होने के कारण अब वे अपनी बहुओं और बेटियों को परीक्षा नहीं दिला पाएंगे। क्या जिला प्रशासन इन महिलाओं की ‘शिक्षा की बलि’ चढ़ाने का उत्तरदायी बनेगा?
अधिकारियों का ‘गोलमोल’ रवैया
जब मामले में जिला शिक्षा अधिकारी लाल जी द्विवेदी से तीखे सवाल पूछे गए, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं था। ‘संभावना’ और ‘अभिज्ञान की कमी’ जैसे शब्दों के पीछे छिपना यह दर्शाता है कि विभाग अपनी जवाबदेही से भाग रहा है। आखिर वह कौन सी ‘शक्ति’ है जिसके दबाव में अधिकारी सच बोलने से कतरा रहे हैं?
‘जनजागरण न्यूज़’ के ज्वलंत सवाल:
1 साजिश का सूत्रधार कौन? 10 साल की सुचारू व्यवस्था को किसके मौखिक या लिखित आदेश पर तहस-नहस किया गया?
2 नियमों का गला क्यों घोंटा? जब संख्या 116 है, तो नियमतः गंडई का हक क्यों छीना गया?
3 गंडई से परहेज क्यों? क्या प्रशासन गंडई की व्यापारिक और क्षेत्रीय प्रगति को बाधित करना चाहता है?
4 मानसिक प्रताड़ना: 16 मार्च से परीक्षा है और 6 दिन पहले जानकारी देना क्या छात्रों के साथ ‘क्रूर मजाक’ नहीं है?
