
गैस संकट.रसोइयों में पसरा सन्नाटा, प्रशासन की ‘जब्ती’ वाली सख्ती; क्या चूल्हे की फूंक में उड़ेगा ‘स्वच्छ ईंधन’ का सपना?
गंडई-पंडरिया- एक ओर सरकार ‘उज्ज्वला’ और ‘धुआं मुक्त भारत’ का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि गैस सिलेंडरों की किल्लत ने आम जनता और छोटे होटल संचालकों की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि लोग अब गैस छोड़कर दोबारा लकड़ी के चूल्हों की ओर लौटने को मजबूर हो गए हैं।
दबिश या दोहरी मार? होटल संचालकों में आक्रोश
सोमवार को खाद्य विभाग की टीम ने जीराटोला स्थित ‘नटराज हाईवे होटल एंड ढाबा’ पर छापा मारकर 3 घरेलू सिलेंडर जब्त किए। प्रशासन इसे ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955’ का उल्लंघन बता रहा है, लेकिन होटल संचालकों का सवाल है कि— “जब कमर्शियल सिलेंडर बाजार में सही समय मे उपलब्ध ही नहीं हैं, तो हम होटल कैसे चलाएं?”
गंडई क्षेत्र के व्यापारियों का कहना है कि व्यावसायिक सिलेंडरों की सप्लाई चेन पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। मजबूरी में कई होटलों ने चाय बनाना तक बंद कर दिया है ताकि बचे हुए ईंधन से सिर्फ खाना बनाया जा सके। व्यापारियों ने तीखे शब्दों में कहा कि एक तरफ आपूर्ति ठप है और दूसरी तरफ विभाग कार्रवाई के नाम पर दुकानदारों को प्रताड़ित कर रहा है।
संयुक्त परिवारों की रसोई पर ‘ताला’: 20 की जगह 45 दिन का इंतजार
गैस रिफिलिंग की समय सीमा में हुई अप्रत्याशित वृद्धि ने आम घरों का बजट बिगाड़ दिया है।
* लंबा इंतजार: जो सिलेंडर पहले 20 दिन में मिल जाता था, अब उसके लिए उपभोक्ताओं को 25 से 45 दिनों तक दर-दर भटकना पड़ रहा है।
* मजबूरी का सौदा: संयुक्त परिवारों के लिए एक सिलेंडर महीने भर भी नहीं चल पा रहा। आपूर्ति न होने के कारण लोग राशि खर्च कर नया कनेक्शन लेने को मजबूर हैं।
बीमारियों और पर्यावरण विनाश को न्योता
आम जनता का कहना है कि प्रशासन की नाकामी की सजा पर्यावरण को भुगतनी पड़ रही है। लोग अब फिर से लकड़ी भट्टी और चूल्हे जलाने को मजबूर हैं। इससे न केवल फेफड़ों की बीमारियां बढ़ेंगी, बल्कि जंगलों की कटाई भी तेज होगी। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन केवल जब्ती की कार्रवाई तक सीमित रहेगा या गैस की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भी कोई कदम उठाएगा?
