
120 करोड़ के घोटाले की रिपोर्टिंग पर मौत और 2025 में 33 हमले, क्या आपका कलम भी खतरे में है? जानिए क्यों अब देश मांग रहा है राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून!
“जब सच लिखने की कीमत जान देकर चुकानी पड़े, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ खुद आईसीयू में है।”
गंडई पंडरिया- लोकतंत्र में पत्रकार को अक्सर “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। इसकी वजह केवल यह नहीं कि वह घटनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाता है, बल्कि इसलिए भी कि वह सत्ता, प्रशासन, पुलिस, भ्रष्टाचार और व्यवस्था से जुड़े कड़े सवाल पूछता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कलम से आप समाज की आवाज उठाते हैं, उस कलम की रक्षा करने वाला कोई कानून इस देश में क्यों नहीं है?
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष जिग्नेश कलावडिया ने भारत में पत्रकारों की सुरक्षा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि एक व्यापक और प्रभावी राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून अब वक्त की सबसे बड़ी मांग बन चुका है।
खौफनाक आंकड़े, क्या ऐसे होगी स्वतंत्र पत्रकारिता?
33 हमले और 8 गिरफ्तारियां:– राष्ट्रीय संगठन महासचिव महफ़ूज़ खान ने ‘फ्री स्पीच कलेक्टिव’ की रिपोर्ट (2025) का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2025 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े 14,875 मामलों में 33 गंभीर हमले सीधे पत्रकारों के खिलाफ हुए। इसके अलावा 14 उत्पीड़न, 12 धमकियां और 8 पत्रकारों की गिरफ्तारियां दर्ज की गईं।
हत्याओं का काला रिकॉर्ड: -‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ (CPJ) के अनुसार, 2025 में दुनिया भर में 129 मीडियाकर्मी मारे गए—जो 1992 के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है। भारत भी इस सूची में शामिल रहा, जहां न्याय और जवाबदेही का अभाव साफ दिखा।
वैश्विक रैंकिंग में फिसलता भारत:– ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ के 2026 वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है (स्कोर 31.96)। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि संस्थागत स्तर पर पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।
मुकेश चंद्राकर हत्याकांड, रोंगटे खड़े कर देने वाला सच
राष्ट्रीय महासचिव राकेश सिंह परिहार ने छत्तीसगढ़ के साहसी पत्रकार मुकेश चंद्राकर की नृशंस हत्या का जिक्र करते हुए देश की ग्राउंड रियलिटी पर गंभीर सवाल उठाए।
क्या था गुनाह? 28 वर्षीय स्वतंत्र पत्रकार मुकेश चंद्राकर ने करीब 120 करोड़ रुपये के सड़क निर्माण प्रोजेक्ट में कथित भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया था।
अंजाम: 3 जनवरी 2025 को उनका शव एक सेप्टिक टैंक में मिला।
यह घटना चीख-चीखकर कहती है कि छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले स्वतंत्र और डिजिटल पत्रकार किस तरह स्थानीय भूमाफियाओं, भ्रष्ट ठेकेदारों और राजनीतिक दबाव के साये में काम करने को मजबूर हैं। बड़े संस्थानों जैसी कानूनी ढाल न होने के कारण वे सीधे अपराधियों के निशाने पर होते हैं।
कानून का मतलब ‘अपराध की छूट’ नहीं, बल्कि ‘प्रतिशोध से सुरक्षा’
राष्ट्रीय महासचिव रत्नाकर त्रिपाठी “सामवेदी” ने यह स्पष्ट किया कि पत्रकार सुरक्षा कानून का उद्देश्य किसी को कानून से ऊपर रखना नहीं है। यदि कोई पत्रकार अपराध करता है, तो कानून अपनी कार्रवाई करे। लेकिन केवल इसलिए कि उसने किसी ताकतवर शख्स या भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ खबर लिखी है, उसे हिंसा, झूठे मुकदमों या मौत के घाट उतार दिया जाए—यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष गोविंद शर्मा ने बताया कि महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ ने इस दिशा में ‘मीडिया पर्सन्स एंड मीडिया इंस्टीट्यूशंस एक्ट’ लाकर एक सराहनीय पहल की है, लेकिन देश को अब एक समान राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून की सख्त आवश्यकता है।
राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून में क्या हों मुख्य प्रावधान?
तत्काल जांच: पत्रकार पर पेशेवर काम से जुड़े हमले की सूचना पर तुरंत विशेष नोडल एजेंसी द्वारा जांच हो।
धमकी पर सुरक्षा मूल्यांकन: लगातार धमकियों मिलने पर जोखिम का आकलन कर सुरक्षा मुहैया कराई जाए।
समयबद्ध ट्रायल: गंभीर हमलों या हत्या के मामलों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट और वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी हो।
डिजिटल सुरक्षा का दायरा: सड़क पर होने वाले हमलों के साथ-साथ ऑनलाइन ट्रोलिंग, डॉक्सिंग और साइबर उत्पीड़न को भी कानूनन अपराध माना जाए।
फ्रीलांस व ग्रामीण पत्रकारों को संरक्षण: सुरक्षा का दायरा सिर्फ बड़े संस्थानों तक सीमित न रहकर जमीनी स्तर के हर स्वतंत्र पत्रकार तक हो।
पत्रकार की सुरक्षा—यानी आपकी अपनी सुरक्षा!
उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अजय प्रताप नारायण सिंह ने कहा कि जब कोई पत्रकार सरकारी अस्पताल की बदहाली, सड़क भ्रष्टाचार, अवैध खनन या जनता के हक की बात उठाता है, तो वह किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि आपकी (जनता की) आवाज बनता है।
यदि पत्रकार ही सुरक्षित नहीं रहेगा, तो सच सामने नहीं आएगा; और जब सच नहीं आएगा, तो सत्ता कभी जवाबदेह नहीं बनेगी।
